भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस सह्याद्रि और आईएनएस कुलिश ने एडीएमएम-प्लस समुद्री सुरक्षा संयुक्त सहयोग गतिविधि में अपनी भागीदारी सफलतापूर्वक पूरी कर ली है, जो भारत की समुद्री कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में उसकी सक्रिय भूमिका का ताजा संकेत है। यह गतिविधि ऐसे समय में संपन्न हुई है जब हिंद-प्रशांत में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, संकट-प्रबंधन और बहुपक्षीय समन्वय को लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज बनी हुई है।
समुद्री समन्वय का संकेत
एडीएमएम-प्लस, यानी आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस, एशिया-प्रशांत सुरक्षा वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण मंच है, जहां समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता, आपदा राहत, आतंकवाद-रोधी सहयोग और पारस्परिक विश्वास-निर्माण जैसे मुद्दों पर भागीदार देश मिलकर काम करते हैं। भारतीय नौसेना के दो जहाजों की इस संयुक्त सहयोग गतिविधि में भागीदारी केवल एक औपचारिक उपस्थिति नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत की उस रणनीति का हिस्सा देखा जा रहा है जिसमें वह क्षेत्रीय समुद्री स्थिरता के लिए एक विश्वसनीय, सक्षम और साझेदार-उन्मुख शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है।
आईएनएस सह्याद्रि, जो स्वदेशी निर्माण और उन्नत युद्धक क्षमताओं का प्रतिनिधि है, तथा आईएनएस कुलिश, जो तटीय और सतही अभियानों में उपयोगी मंच है, दोनों की भागीदारी भारतीय नौसेना की परिचालन विविधता को भी दर्शाती है। ऐसे अभियानों में जहाजों की तैनाती केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं होती; यह संचार, समन्वय, समुद्री निगरानी, संयुक्त अभ्यास और मानक संचालन प्रक्रियाओं के तालमेल का परीक्षण भी होती है।
रणनीतिक संदेश
भारत के लिए यह भागीदारी कई स्तरों पर मायने रखती है। पहला, यह आसियान केंद्रित सुरक्षा संवादों में भारत की निरंतर उपस्थिति को मजबूत करती है। दूसरा, यह उन देशों के साथ व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाती है जो समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने, तस्करी, समुद्री आपदा और संचार मार्गों पर जोखिम जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तीसरा, यह भारत की उस व्यापक समुद्री नीति से मेल खाती है जिसमें 'सुरक्षा और विकास सभी के लिए' की अवधारणा को हिंद महासागर और उससे आगे तक विस्तारित करने की कोशिश की जा रही है।
विश्लेषकों के मुताबिक, ऐसे मंचों पर भागीदारी का महत्व इस बात में भी है कि यह नौसैनिक बलों को वास्तविक बहुपक्षीय वातावरण में काम करने का अवसर देती है। अलग-अलग संचार प्रणालियों, परिचालन सिद्धांतों और कमान संरचनाओं के बीच तालमेल बनाना किसी भी आधुनिक नौसेना के लिए अनिवार्य है। भारत के लिए यह क्षमता विशेष रूप से अहम है, क्योंकि वह न केवल अपने समुद्री हितों की रक्षा करना चाहता है, बल्कि मित्र देशों के साथ संयुक्त प्रतिक्रिया क्षमता भी विकसित कर रहा है।
हिंद-प्रशांत में भूमिका
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा अब केवल नौसैनिक गश्त का प्रश्न नहीं रह गया है। इसमें आपूर्ति श्रृंखलाओं की निर्बाधता, ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा, बंदरगाहों की लचीलापन क्षमता और संकट के समय त्वरित मानवीय प्रतिक्रिया भी शामिल है। एडीएमएम-प्लस जैसी गतिविधियां इन सभी आयामों को एक साझा मंच पर लाती हैं। भारत की भागीदारी यह संकेत देती है कि वह क्षेत्रीय सुरक्षा को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी के रूप में देखता है।
नई दिल्ली के लिए यह कूटनीतिक रूप से भी उपयोगी है, क्योंकि इससे भारत को आसियान देशों के साथ भरोसेमंद रक्षा साझेदारी को गहरा करने का अवसर मिलता है। साथ ही, यह संदेश भी जाता है कि भारतीय नौसेना केवल राष्ट्रीय जलसीमा की रक्षक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता की सक्रिय भागीदार है।
इस तरह की गतिविधियों का असर तत्काल सुर्खियों से आगे जाता है। वे समुद्री क्षेत्र में मानक-निर्धारण, संकट-समन्वय और सामूहिक प्रतिक्रिया की नींव तैयार करती हैं। आईएनएस सह्याद्रि और आईएनएस कुलिश की सफल भागीदारी भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें नौसैनिक क्षमता, कूटनीतिक पहुंच और बहुपक्षीय सहयोग को एक साथ साधने की कोशिश की जा रही है।





