भारत ने रोम में आयोजित खाद्य एवं कृषि संगठन की वन समिति (COFO 28) में वन और भू-दृश्य पुनर्स्थापन से जुड़ी अपनी पहलों को पेश करते हुए यह संकेत दिया कि वह पर्यावरणीय बहाली को केवल संरक्षण के मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, जलवायु अनुकूलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के एकीकृत एजेंडा के रूप में देख रहा है। इस मंच पर भारत की प्रस्तुति ने उन नीतिगत प्राथमिकताओं को सामने रखा जिनमें degraded landscapes की बहाली, वन संसाधनों का सतत प्रबंधन और समुदाय-आधारित भागीदारी को केंद्रीय महत्व दिया गया है।
नीति का बहु-स्तरीय दृष्टिकोण
भारत की भागीदारी का सबसे अहम पहलू यह रहा कि उसने वन पुनर्स्थापन को अलग-थलग पर्यावरणीय परियोजना की तरह नहीं, बल्कि व्यापक भू-दृश्य प्रबंधन के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया। इसका अर्थ है कि वन, कृषि, जल-संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता और स्थानीय आजीविका को एक ही नीति-फ्रेम में देखा जा रहा है। यह दृष्टिकोण उस वैश्विक बहस से मेल खाता है जिसमें भूमि क्षरण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली को सतत विकास लक्ष्यों, जलवायु प्रतिबद्धताओं और खाद्य सुरक्षा से जोड़ा जा रहा है।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के कई हिस्सों में वन-सीमांत क्षेत्रों, सूखे इलाकों और क्षरित भूमि में पुनर्स्थापन की आवश्यकता एक साथ मौजूद है। नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि ऐसी बहाली है जो स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप हो, दीर्घकालिक जीवित रहने की दर सुनिश्चित करे और समुदायों को आर्थिक लाभ भी दे। COFO 28 में भारत की प्रस्तुति ने इसी संतुलन को रेखांकित किया—जहां संरक्षण और विकास को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना गया।
वैश्विक मंच पर भारत
रोम में यह प्रस्तुति भारत की उस कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा भी मानी जा रही है जिसमें वह जलवायु और भूमि-प्रबंधन के वैश्विक विमर्श में एक सक्रिय, समाधान-उन्मुख भागीदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब केवल उत्सर्जन कटौती की बात नहीं हो रही; बहाली, अनुकूलन, प्रकृति-आधारित समाधान और खाद्य प्रणालियों की स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई हैं। ऐसे में भारत का COFO 28 में वन एवं भू-दृश्य पुनर्स्थापन पर जोर देना उसकी घरेलू नीति और वैश्विक संदेश, दोनों को एक साथ आगे बढ़ाता है।
विश्लेषकों के अनुसार, भारत की यह प्रस्तुति उन देशों के लिए भी संदर्भ बन सकती है जो बड़े पैमाने पर भूमि क्षरण, वनाग्नि, जैव विविधता हानि और जल संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। भारत ने जिस तरह बहाली को बहु-क्षेत्रीय नीति के रूप में पेश किया, वह यह दर्शाता है कि भविष्य की पर्यावरणीय रणनीतियां केवल पर्यावरण मंत्रालयों तक सीमित नहीं रहेंगी; उनमें कृषि, ग्रामीण विकास, जल संसाधन और स्थानीय शासन की साझा भूमिका अनिवार्य होगी।
समुदाय और आजीविका
वन एवं भू-दृश्य पुनर्स्थापन की बहस में भारत का एक और महत्वपूर्ण संकेत यह रहा कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सफलता की शर्त माना जा रहा है। भारत जैसे देश में वन संसाधनों पर निर्भर आबादी बड़ी है, इसलिए किसी भी पुनर्स्थापन कार्यक्रम की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह लोगों की आजीविका, ईंधन, चारा, जल और गैर-लकड़ी वन उत्पादों की जरूरतों के साथ कितना न्याय करता है।
इसी कारण, पुनर्स्थापन की नीति का मूल्यांकन केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता, भूमि की उत्पादकता, जल-धारण क्षमता और समुदायों के लिए दीर्घकालिक लाभ से होना चाहिए। भारत की प्रस्तुति ने संकेत दिया कि सरकार इस दिशा में ऐसे मॉडल को प्राथमिकता दे रही है जिसमें स्थानीय संस्थाएं, वैज्ञानिक आकलन और क्षेत्र-विशिष्ट योजना एक साथ काम करें।
COFO 28 में भारत का यह रुख उस व्यापक प्रशासनिक सोच को भी दर्शाता है जिसमें जलवायु कार्रवाई को राजकोषीय, सामाजिक और संस्थागत नीति से जोड़ा जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन पहलों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है और क्या वे वास्तव में क्षरित भू-दृश्यों को पुनर्जीवित करने, वन-आश्रित समुदायों को सशक्त बनाने और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को ठोस परिणामों में बदलने में सक्षम होती हैं। फिलहाल, रोम में भारत की प्रस्तुति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई पर्यावरणीय राजनीति में पुनर्स्थापन अब परिधि का नहीं, केंद्र का विषय बन चुका है।




