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2026/09/28National Governance & Policy

अभ्यास तरंग शक्ति-2026: भारत ने साझेदारी-आधारित समुद्री शक्ति का संकेत दिया

अभ्यास तरंग शक्ति-2026 को भारत की समुद्री तैयारी, अंतर-संचालन क्षमता और साझेदारी-आधारित सुरक्षा दृष्टि के एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। 'साझेदारी में शक्ति' की थीम इस बात का संकेत देती है कि नई दिल्ली हिंद-प्रशांत में सुरक्षा को अकेले नहीं, बल्कि सहयोगी ढांचे के जरिए आगे बढ़ाना चाहती है।

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National Governance & Policy Desk

New Delhi, India Recently•4 min read
अभ्यास तरंग शक्ति-2026: भारत ने साझेदारी-आधारित समुद्री शक्ति का संकेत दिया
Editorial Photo: New Delhi, India — अभ्यास तरंग शक्ति-2026: भारत ने साझेदारी-आधारित समुद्री शक्ति का संकेत दियाRDU Global Media

समुद्री शक्ति का संकेत

03:33 AM IST पर सामने आई इस पहल ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और नीति-निर्माण की दिशा पर एक स्पष्ट संदेश दिया है: समुद्री क्षेत्र अब केवल नौसैनिक क्षमता का प्रश्न नहीं, बल्कि कूटनीति, तकनीक, आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा और क्षेत्रीय भरोसे का भी केंद्र बन चुका है। अभ्यास तरंग शक्ति-2026, जिसकी थीम 'साझेदारी में शक्ति' रखी गई है, भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखता है जिसमें सैन्य तैयारी को बहुपक्षीय सहयोग के साथ जोड़ा जा रहा है।

यह अभ्यास ऐसे समय में उभर रहा है जब हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अवैध गतिविधियों पर निगरानी, और संकट-प्रतिक्रिया क्षमता को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज है। भारत के लिए यह केवल एक सैन्य आयोजन नहीं, बल्कि नीति-संदेश भी है: वह समुद्री स्थिरता का उपभोक्ता नहीं, उसका सक्रिय निर्माता बनना चाहता है।

सरकारी और रक्षा प्रतिष्ठान में इस तरह के अभ्यासों को अक्सर परिचालन तत्परता के परीक्षण के रूप में देखा जाता है, लेकिन तरंग शक्ति-2026 का राजनीतिक अर्थ इससे बड़ा है। यह भारत की उस सोच को रेखांकित करता है जिसमें साझेदार देशों के साथ तालमेल, मानकीकृत प्रक्रियाएं, और संयुक्त अभ्यास भविष्य की सुरक्षा वास्तुकला की आधारशिला माने जा रहे हैं।

साझेदारी की नई भाषा

'साझेदारी में शक्ति' केवल एक नारा नहीं, बल्कि बदलते सुरक्षा वातावरण में भारत की कूटनीतिक भाषा का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने समुद्री सहयोग को पारंपरिक रक्षा सहयोग से आगे बढ़ाकर मानवीय सहायता, आपदा राहत, समुद्री डोमेन जागरूकता और संयुक्त समन्वय तक विस्तारित किया है। ऐसे अभ्यास इस प्रवृत्ति को संस्थागत रूप देते हैं।

नीति के स्तर पर इसका महत्व दोहरा है। पहला, यह भारत को उन देशों के साथ अधिक सहज बनाता है जो नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था, खुले समुद्री मार्गों और संकट के समय पारदर्शी समन्वय को प्राथमिकता देते हैं। दूसरा, यह घरेलू स्तर पर यह संदेश देता है कि रक्षा आधुनिकीकरण अब केवल प्लेटफॉर्म खरीदने का मामला नहीं, बल्कि नेटवर्क, प्रशिक्षण और अंतर-संचालन का प्रश्न है।

विश्लेषकों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे अभ्यासों में भागीदारी का विस्तार भारत की विदेश नीति के व्यावहारिक पक्ष को दिखाता है। नई दिल्ली अब सुरक्षा को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा की तरह नहीं, बल्कि साझा हितों के प्रबंधन की तरह प्रस्तुत कर रही है। यही कारण है कि समुद्री अभ्यास अब रणनीतिक संकेतक बन गए हैं—वे बताते हैं कि भारत किन साझेदारियों को प्राथमिकता देता है और किस तरह की क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहता है।

नीति और क्षमता

अभ्यास तरंग शक्ति-2026 की असली परीक्षा उसके दृश्य प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभाव में होगी। यदि यह अभ्यास संचार, समन्वय, खोज-बचाव, समुद्री निगरानी और संयुक्त प्रतिक्रिया की क्षमता को मजबूत करता है, तो इसका असर केवल नौसैनिक संचालन तक सीमित नहीं रहेगा। यह आपदा प्रबंधन, समुद्री व्यापार सुरक्षा और तटीय अवसंरचना की रक्षा पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

भारत के लिए यह समय विशेष रूप से संवेदनशील है। वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं में व्यवधान, ऊर्जा मार्गों की अनिश्चितता और क्षेत्रीय तनाव ने समुद्री सुरक्षा को राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा से जोड़ दिया है। ऐसे में किसी भी बड़े अभ्यास का मूल्यांकन केवल उसकी सैन्य भव्यता से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि वह वास्तविक संकटों में कितनी तेजी और सटीकता से काम आ सकता है।

नीतिगत दृष्टि से, तरंग शक्ति-2026 भारत की उस व्यापक प्राथमिकता को भी पुष्ट करता है जिसमें रक्षा तैयारी, राजनयिक पहुंच और तकनीकी आत्मनिर्भरता को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। 'साझेदारी में शक्ति' का अर्थ यह है कि भारत अपनी क्षमताओं को अलग-थलग नहीं, बल्कि साझा सुरक्षा ढांचे के भीतर अधिक प्रभावी बनाना चाहता है। यही इस अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है: शक्ति अब अकेले प्रदर्शन की नहीं, बल्कि भरोसेमंद सहयोग की मुद्रा बन रही है।

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